ब्लोजोब

ब्लोजोब

मेरी यह कथा मेरे और मेरे साथ काम करती एक टीचर मोना की हैं (उसका भी नाम बदला हुआ हैं). मोना कुछ 23 की ही हैं और हमारी स्कुल में वो अभी नई नई जॉब्स पे लगी हुई हैं.

स्कुल के बच्चो को लेकर मैं, मोना और एक दुसरे टीचर (उन्हें हम गोपाल कहेंगे) गोपाल फन फेयर में गए थे. वैसे सुबह बच्चो को म्यूजियम और चिड़ियाघर तो दिखाया था लेकिन शाम में यहाँ फन फेयर में गए हुए थे. बच्चे तो ढेर सारी राइड्स देख के जैसे पगला ही गए थे. मैंने टिकट विंडो से डिस्काउंट रेट पे बच्चो के टिकट लिए और हम लोग अंदर दाखिल हुए. गोपाल ने तो पहले ही कहा था की उसे राइड्स में उलटी होती हैं और वो केंटिन में ही वेट करेंगा. मोना से मैंने उस वक्त तो कुछ पूछा नहीं लेकिन जब कुछ बच्चे बड़ी राइड में बैठने लगे तो वो भी मेरे साथ में खड़ी हुई थी. मैंने उसे देख के पूछा, “क्या आप भी बैठेंगी इस में…?”

मोना ने सर हिला के हाँ कहा. मैंने बच्चो को बिठा दिया और फिर राइड के आखिरी सिट में मैं खुद जाके बैठ गया. पीछे बैठने का उद्देश्य यह था की बच्चे अगर धांधल करें तो मैं कम से कम पीछे से उन्हें देख सकता था. मोना मेडम ने इधर उधर देखा और वो मेरे बाजू में आके बैठ गई. मुझे थोड़ी झिझक हुई की वो मेरे साथ में बैठी हुई हैं. मैंने साइड में खिसक के उसके लिए आराम से बैठने की जगह बनाई. उसने मेरी और देखा और हंस पड़ी. हम लोग सभी बैठ चुके थे और सभी के आगे लगी हुई लोहें की रोड को लोक कर के राइड का चलाने वाला निकल गया. मोना मेडम ने मेरी और देख के कहा, “सच कहूँ तो आज मैं पह्ली बार ऐसी बड़ी राइड में बैठी हूँ…!”

मैं समझ गया की आज इसकी गांड से हवा जरुर निकलने वाली हैं. मैंने उसे कहा, “अरे जरुरी था क्या इसमें बैठना मेडम. वैसे भी हमारें गोपाल जी और कुछ बच्चे निचे थे उनके साथ रुक जाती.”

मोना ने हंस के कहा, “जिन्दगी में रोमांच भी तो होना चाहियें ना…!”

और जब वो यह शब्द बोली तो उसकी आँखों में एक चमक थी. और वो चमक कुछ ऐसी थी जिसे मैं शायद उस वक्त समझ नहीं पाया था. राइड धीरे से चली और मेरा दिल अपने आप जोर से धड़का. मुझे राइड से डर नहीं लगता हैं लेकिन शरीर की बायोलोजी तो मेरे कंट्रोल में नहीं हैं ना. एक राउंड के बाद तो राइड और भी तेज होने लगी और कुछ बच्चे अब डर के मारे रोने भी लगे थे. तीसरे राउंड के बाद तो राइड जैसे हवा से बातें करने लगी. मोना की तरफ देखा तो देखां की उसके तो होश उड़े हुए थे. उसकी आँखे बंध थी और वो जैसे राइड के घुमने से चकरा चुकी थी. मैंने मनोमन सोचा की फिर क्या अपनी माँ चुदवाने के लिए इस राइड में चढ़ी थी. मोना की आँखे बंध ही थी और राइड तो जैसे अब और भी तेज हो गई. दुसरे ही पल मोना ने मेरे कंधे से मुझे पकड लिया और उसका हाथ यकायक मेरे लंड पे आ गिरा. और उसने जैसे की किसी हेंडल को पकड लिया हो वैसे मेरे लंड को अपने हाथ में दबा दिया. एक पल के लिए तो मैं चौंक ही गया, वैसे भी बदन से ग्रेविटी तो राइड ने निकाल ही दी थी और ऊपर से यह सब. मुझे लगा की शायद मोना राइड से डर के लंड पकड बैठी हैं…! (लेकिन वो मेर भ्रममात्र था)

राइड जैसे जैसे चक्कर खा रही थी उसकी ग्रिप मेरे लंड के ऊपर और भी टाईट हो रही थी. अब उसने थोडा निचे जाके मेरे बोल्स को भी हाथ लगा दिया था. अब की मैं चौंक गया की मोना मेडम कर क्या रही हैं. तभी मेरे दिमाग में उसकी लास्ट लाइन आई की जिन्दगी में थोडा रोमांच तो होना चाहियें. क्या उसके रोमांच का मतलब यह था की वो अपने से 15-20 साल बड़े पुरुष का लंड लेना चाहती थी. मैंने एक गध्य में पढ़ा था की कुछ औरतों की बड़ी उम्र के पुरुषो के साथ शयनसुख में बहुत दिलचस्पी होंती हैं. वैसे मैं कोई बिगड़ा हुआ इंसान नहीं हूँ लेकिन मैं अच्छे होने का ढोंग भी नहीं करता. अगर मोना मेरे लंड को पकड सकती थी तो मैं कम से कम अपनी ज़िप खोल के उसकी मदद कर ही सकता था. वैसे भी राइड की सिट आखरी थी कौन देखने वाला था. यह सोच के मैंने अपनी ज़िप खोल दी. मेरे आश्चर्य के बिच में मोना ने सीधे हाथ को अंदर डाला और लौड़ा सहलाने लगी. यह सब एकदम हो रहा था और मुझे जैसे संभलने का मौका भी नहीं मिला. मोना ने लंड को बराबर मसला और फिर राइड धीमी होने लगी. साला इसे भी अपनी माँ अभी चुद्वानी थी क्या (एक टीचर के मुहं से इतनी गालियाँ शोभा नहीं देती हैं ना…!)

मैंने फट से अपनी ज़िप को बंध की ताकि राइड के रुकने पे हमारा खेल बहार ना आ जाएँ. मोना मेडम तो जैसे की कुछ हुआ ही ना हो वैसे राइड से उतरने लगी. मैं मनोमन सोच रहा था की खड़े लंड पे धोखा क्यूँ दे रही हैं ये. मैंने सउसके साथ लगते हुए उसे धीरे से कहा, “बस की आखरी सिट में बैठेंगे जाने के समय. थोडा मजा हो जायेंगा.”

कुछ देर पहले तक हम दो शरीफ टीचर थे और अभी जैसे कोई मवाली लौंडा लौंडी जो चुदाई का जुगाड़ कर रहे हो. मोना निचे देख के हंसने लगी जो की औरतों की अपनी स्टाइल हैं. फेयर से निकल के हमने शाम का नास्ता रास्ते में ही किया और फिर बच्चो को बस में चढ़ा दिया. मैंने गोपाल से कहा, “मास्टर जी आप आगे वाली सिट पे बैठ जाना क्यूंकि मुझे थोडा शर्दी जैसा लग रहा हैं.”

गोपाल जी ने हाँ में मुंडी हिलाई. वैसे बिच में भी बैठ सकता था लेकिन मैं बस की आखरी सिट में जा बैठा और दो बच्चो को वहां से उठा के मोना की जगह भी बना ली. मैंने तबियत का बहाना कर के बीवी ने दी हुई चद्दर निकाल के अपने बदन पे ढंक ली. मोना आने के समय बस के मध्य भाग में बैठी थी लेकिन अब वो भी मेरे पास ही आके बैठ गई. वैसे भी अब सब थक चुके थे और मुझे पता था की किसी को क्या परवाह होंगी. और गोपाल को तो पीछे दिखना बी मुश्किल था क्यूंकि बस में काफी अँधेरा हो चूका था; ड्राईवर ने बस उठाते ही लाईट को डिम जो किया था.

मोना के बगल में बैठते ही मैं उसके ऊपर भी चद्दर डाली. मेरा हाथ सीधे उसकी चुंची पे गया जिसे मैंने अपने हाथों से नोंचना चालू कर दिया. मोना के बगल की एक सिट भी खाली थी क्यूंकि मैंने दो बच्चो को आगे भेजा था. मोना ने अपनी टाँगे आगे की. बस मंद मंद गति से चल रही थी और बहार की ठंडी ठंडी पवन अंदर आ रही थी. मोना के स्पर्श से मेरा लंड भी टाईट हुआ था, जिसे बस में चढ़ते वक्त काफी हद तक छिपा रखा था. मोना ने अब इधर उधर देखा और वो चद्दर ने अंदर आ गई. मैंने महसूस किया की उसने मेरी ज़िप को धीरे से खोला और लौड़े को बहार निकालने लगी. और उसके बाद का पल मेरे जीवन का एक धन्य लम्हा था. वाह यह जवान टीचर ने अपने होंठो को मेरे लंड के सुपाडे के ऊपर रख दिए थे और वो धीरे धीरे से उसे चूस रही थी. मेरी उत्तेजना उस वक्त क्या होंगी उसका आप अंदाजा कर ही सकते हैं.

मोना ने मेरा लंड मुहं में लिया

मोना ने अब अपने हाथ से मेरे लंड के डंडे को भी बहार निकाल दिया और वो उसे हिलाते हुए सुपाडे को चूस रही थी. मेरे तोते उड़े हुए थे. आखरी बार मेरा लौड़ा मेरी बीवी ने आजसे कुछ दस साल पहले चूसा था और फिर आज मोना ने उसे यह सुख दिया हैं. मोना ने अब दुसरे हाथ से मेरे अंडकोष को पकड़ा और वो उसके अंदर की गोलियों को दबाने लगी. मेरे मुहं से आनदं के चीत्कार निकल जाते यदि मैंने अपनेआप पे कंट्रोल ना किया होता. मोना ने अब धीरे से लंड को मुहं में और भी आगे तक लिया. आधे से ज्यादा लौड़ा अब उसके मुहं में घुसा हुआ था और वो उसे ऐसी ही उत्तेजना से चूस रही थी. हाय रे मेरी किस्मत आज तो मुझ पे कुछ ज्यादा ही महेरबान थी.

मोना ने अब मेरे लंड को हिलाते हुए अपना चूसना जारी रखा और मैं कभी पांचवे, कभी छठे तो कभी सातवें आसमान पे घूमता था. मोना कस के लौड़े को मुहं में दबा रही थी और अपने मुहं का जादू चला रही थी. मैं इस जादू को और कितना झेल पाता. कुछ पांच मिनिट की मस्त चुसाई के बाद मोना के मुहं में ही मेरा माल निकल गया. उसने पता नहीं उसके साथ क्या किया लेकिन जब उसका मुहं बहार आया तो उसकी एक भी बूंद मुझे तो दिखी नहीं. मोना ने चद्दर अपनी टांगो पे रखी और वो ऐसे सो गई जैसे की कुछ हुआ ही नहीं. मैंने मन में एक इरादा किया की मोना मेडम की चूत में अपने लंड के झंडे को अब मैं गाड़ के ही रहूँगा…..!

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